सरकार के पावर की दास्ताँ,झाबुआ में नये कलेक्टर का आगमन- पुराने कलेक्टर पहुंचे भोपाल।

सरकार के पावर की दास्ताँ,
झाबुआ में नये कलेक्टर का आगमन- पुराने कलेक्टर पहुंचे भोपाल।

19 अगस्त 2020 को भोपाल से एक आदेश जारी कर करीब 12 बडे-बडे अधिकारीयों का तबादला कर दिया। इस श्रंखला में जिला झाबुआ का भी नाम था। झाबुआ कलेक्टर प्रबल सिपाहा को भोपाल पहूंचा दिया और झाबुआ कलेक्टर की कुर्सी पर दतिया कलेक्टर को बैठाया। 
अब बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों का कहना है कि पूर्व कलेक्टर प्रबल सिपाहा को तो उसी वक्त बदल दिया जाता। जब भाजपा ने पेतरा लगा कर कांग्रेस को गिरा कर सरकार छीन ली थी। 
राजनीतक बाशिंदो का मानना था कि, कलेक्टर सिपाहा, कांग्रेस विचारधारा को प्राथमिकता देते है, और इस संबंध में अनेकोनेक उदहारण भी दिये जैसे कि लॉक डाउन में जो पार्टी पक्ष को समर्थन किया। 
हालांकि भाजपा सरकार बनी तो जिले के सभी भाजपाईयों के मन में लड्डू फटाफट फुटे, और यही सोचा की कांग्रेस सरकार ने जितने भी अधिकारी कर्मचारी जिले में बदले, सबको फिर से बदल देंगे। मगर यह हो न सका। क्युंकि कोविड 19 में सब उलझ गये और भाजपाइयो का बम फुस्सी हो गया। 
एक भी अधिकारी कर्मचारी का ट्रांसफर नहीं करवा पाये। यहां तक की कांग्रेस सरकार ने जिन लोगों के  ट्रांसफर कर परेशान किया उनको भी संतुष्टी नहीं दिला पाये। 
फिर जब थोडा जोर लगाया तो पुलिस कप्तान को आउट किया तब भी जिले के भाजपाई पोमाए और फिर से कलेक्टर प्रबल सिपाहा के ट्रांसफर की बात करने लगे।
 लेकिन जिले के भाजपाइयों की कोहनी में गूड़ लगा ही रहा, और कलेक्टर ने सतरंज की बिसात पर घोड़े की तरह ढाई चाल चल दी। 

अब सांसद का खुद कलेक्टर के साथ खड़े खड़े खेल करना शुरू... हो गया था।
इसी बीच सांसद के नुमाईंदों ने सप्लाई के खेल में मदारी का खेल दिखा दिया। खेल तो पुरा हुआ, लोगों ने देखा भी, मगर अन्त में सबकी जेब कट गयी। 
चोर ने हाथ बांध लिये और मुस्कुराकर  शीष झूका दिया। उस पर आशीर्वाद सांसद का भी मिला और विधायक का भी। 
कोविड के खेल में फिर लंबा पेतरा लगाया जिसमें कुछ पत्रकारों ने भी पाला बदला। और खेल करोड़ो के भ्रष्टाचार पर पहुंचा। 
माथे पर हाथ सांसद का और गले विधायक का हाथ होने पर तेवर तीसरे आसमां से आगे थे। 
लोगों का तो यहां तक कहना था की भाजपा जिलाध्यक्ष की बात भी सुनी अनसुनी कर दी जाती थी।  
सरकार बदलने पर भी कांग्रेस कुमारों के काम रुकते नहीं थे। और जिले के भाजपाइ अगले बगले झांकते थे। 
भाजपाइ बाशिंदे हर सप्ताह एक बात उडाते थे कि कलेक्टर के ट्रांसफर की लिस्ट तैयार हो गयी है मगर गर्म केटली ठण्डी हो जाती।
अन्ततः जब एक समय ऐसा आया की भाजपा के प्रदेश प्रमुख ने जिला कलेक्टर को किसी काम के लिये फोन लगाया लेकिन कलेक्टर सिपाहा ने रिस्पोंस नहीं दिया।
दबी जुबां से कहने वाले कहते है कि बस उस दिन के बाद से ही झाबुआ में उलटी गिनती शुरू हो गयी और लिस्ट आयी कलेक्टर के ट्रांसफर की।

बहरहाल, चिडियाँ अगर कचरे में दाना चुगे तो, दानियों को डूब मरना चाहिये। भाजपा ने ताकत लगा कर ट्रांसफर किया तो कलेक्टर को उपसचिव बना कर क्यूं भेजा। भाजपाइयों की तरंगे खुली मगर कोहनी में गूड़ तो अभी भी लगा हुआ है जिसे खाने की बात तो दूर वो ठीक से देख भी नहीं सकते है।
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